हाइलाइट्स
- अल्फा-गैल सिंड्रोम टिक के काटने से होने वाली एक गंभीर एलर्जी है, जो मीट और डेयरी उत्पादों को शरीर के लिए खतरनाक बना देती है।
- अमेरिका में अनुमानित 4.5 लाख लोग इस बीमारी से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन जागरूकता बेहद कम है।
- इस सिंड्रोम का असर कई महीनों बाद भी दिख सकता है, जिससे इसे पहचानना कठिन हो जाता है।
- लक्षणों में खुजली, सूजन, पेट दर्द, उल्टी और जानलेवा एनाफिलेक्सिस शामिल हैं।
- टिक से बचाव और परहेज ही इस एलर्जी से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।
अल्फा-गैल सिंड्रोम क्या है?
अल्फा-गैल सिंड्रोम एक दुर्लभ लेकिन तेजी से फैल रही एलर्जी है, जिसमें शरीर मांस और अन्य पशु-उत्पादों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। यह एलर्जी एक विशेष शुगर मॉलिक्यूल गैलेक्टोज-अल्फा-1,3-गैलेक्टोज (अल्फा-गैल) की वजह से होती है, जो गाय, सूअर, हिरण जैसे जानवरों के टिशू में पाया जाता है। इंसानों में यह मॉलिक्यूल नहीं होता।
जब कोई टिक (एक छोटा परजीवी कीड़ा) इंसान को काटता है, तो वह अपने थूक के जरिए यह शुगर मॉलिक्यूल शरीर में पहुंचा देता है। इसके बाद जब व्यक्ति मांस या उससे बने उत्पादों का सेवन करता है, तो शरीर इसे दुश्मन मानकर एलर्जिक रिएक्शन शुरू कर देता है। यही वजह है कि इस बीमारी को लोग अक्सर “रेड मीट एलर्जी” भी कहते हैं।
लक्षण धीरे-धीरे दिखने वाला खतरनाक असर
अल्फा-गैल सिंड्रोम की सबसे जटिल बात यह है कि इसके लक्षण तुरंत नहीं आते। आमतौर पर मांस या डेयरी उत्पाद खाने के 2 से 6 घंटे बाद शरीर में प्रतिक्रिया शुरू होती है।
सामान्य लक्षण:
- खुजली और लाल चकत्ते
- होंठ, चेहरा या आंखों के आसपास सूजन
- पेट दर्द और उल्टी
- सांस लेने में तकलीफ
- गंभीर मामलों में एनाफिलेक्सिस (जानलेवा एलर्जिक शॉक)
इस बीमारी की पहचान करना मुश्किल इसलिए है क्योंकि मरीज और डॉक्टर अक्सर इसे फूड पॉइजनिंग समझ लेते हैं। अमेरिका में किए गए एक सर्वे के मुताबिक, करीब 42% डॉक्टरों को इस बीमारी की जानकारी ही नहीं है। कई मामलों में सही निदान करने में सालों लग जाते हैं।
अल्फा-गैल सिंड्रोम क्यों बढ़ रहा है?
पहले माना जाता था कि यह बीमारी केवल दक्षिण-पूर्व अमेरिका तक सीमित है और इसे फैलाने वाला मुख्य टिक है लोन स्टार टिक। लेकिन हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि कई अन्य टिक प्रजातियां, जैसे कि डियर टिक, भी इसे फैला रही हैं।
अब ये टिक जंगलों तक सीमित नहीं रहे।
- पार्क
- बगीचे
- शहरों के ग्रीन एरिया
में भी इनकी संख्या बढ़ रही है।
जलवायु परिवर्तन, जंगलों में मानव हस्तक्षेप और वन्यजीवों की बढ़ती आवाजाही भी इस बीमारी के प्रसार का कारण बन रहे हैं।
अल्फा-गैल सिंड्रोम का निदान और टेस्टिंग
इस एलर्जी का निदान करने के लिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट करते हैं, जिसमें शरीर में अल्फा-गैल एंटीबॉडी की जांच होती है।
यदि आपको संदेह है कि मीट या डेयरी प्रोडक्ट खाने के बाद आपको एलर्जी हो रही है, तो तुरंत एलर्जिस्ट से संपर्क करें।
इलाज और प्रबंधन: दवा नहीं, परहेज है उपाय
अल्फा-गैल सिंड्रोम का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन परहेज और सतर्कता से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
जरूरी कदम:
- मांस और डेयरी से परहेज: लाल मांस, जिलेटिन, कुछ दवाओं और ब्यूटी प्रोडक्ट से दूरी बनाएं।
- टिक से बचाव:
- जंगल या घास वाले क्षेत्रों में जाने से पहले टिक-रिपेलेंट का इस्तेमाल करें।
- फुल स्लीव कपड़े पहनें।
- घर लौटने पर पूरे शरीर की जांच करें।
- आपातकालीन दवा साथ रखें:
- गंभीर एलर्जी के मामले में डॉक्टर एपिनेफ्रिन ऑटो-इंजेक्टर लिख सकते हैं।
- डॉक्टर से नियमित संपर्क:
- लक्षणों पर नज़र रखें और ब्लड टेस्ट कराते रहें।
वैज्ञानिकों की चेतावनी: बीमारी को हल्के में न लें
अमेरिकी CDC (Centers for Disease Control and Prevention) की रिपोर्ट के अनुसार, अल्फा-गैल सिंड्रोम के मामलों में हर साल तेज़ी से इजाफा हो रहा है।
- अनुमान है कि करीब 4.5 लाख अमेरिकी इस बीमारी से प्रभावित हैं।
- हालांकि भारत में इसके आधिकारिक आंकड़े नहीं हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि टिक प्रजातियों के बढ़ने से भारत में भी इसका खतरा बढ़ सकता है।
लोगों की अनदेखी से बढ़ता खतरा
ज्यादातर लोग मांस खाने के बाद एलर्जी को “खराब खाना” समझते हैं, जिससे सही समय पर इलाज नहीं हो पाता। टिक के काटने और इस सिंड्रोम के बीच का लंबा समय भी इसे समझने में मुश्किल पैदा करता है।
जागरूकता ही बचाव का सबसे बड़ा हथियार
अल्फा-गैल सिंड्रोम अभी तक आम लोगों के बीच एक अनजानी बीमारी है, लेकिन इसका खतरा तेज़ी से बढ़ रहा है। टिक के काटने से होने वाली इस एलर्जी से बचने के लिए
- जंगल या पार्क में सतर्कता
- मांस और डेयरी उत्पादों पर ध्यान
- समय रहते ब्लड टेस्ट
जैसे कदम उठाना बेहद जरूरी है।
जितनी जल्दी लोग इसके बारे में जानेंगे, उतना ही आसानी से इस जानलेवा बीमारी से बचा जा सकेगा।