हाइलाइट्स
- मथुरा पुलिस की बर्बरता ने एक बार फिर यूपी पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं
- युवक ने CM पोर्टल पर पुलिस के खिलाफ शिकायत की तो पुलिस ने ही बना लिया उसे निशाना
- चौकी में बुलाकर गुप्तांगों पर लात-घूंसे मारे, गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया
- सवाल उठता है—क्या अब न्याय मांगना ही अपराध बन गया है यूपी में?
- आला अधिकारियों की चुप्पी और कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति से जनता में रोष
क्या शिकायत करना अपराध है? मथुरा पुलिस की बर्बरता ने खोली यूपी पुलिस की सोच की पोल
फोकस कीवर्ड: मथुरा पुलिस की बर्बरता
उत्तर प्रदेश में मथुरा पुलिस की बर्बरता का ताजा मामला फिर से पुलिसिया क्रूरता और सत्ता के नशे में चूर तंत्र की हकीकत सामने लाता है। यह घटना न सिर्फ मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि क्या आम जनता की आवाज उठाना अब खतरे से खाली नहीं रहा?
एक युवक ने जब स्थानीय पुलिस के व्यवहार के खिलाफ मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई, तो उसे न्याय मिलना तो दूर, पुलिस का कहर ही झेलना पड़ा। शिकायत से नाराज़ SI ने युवक को चौकी बुलाकर न केवल अवैध रूप से हिरासत में लिया, बल्कि उसके गुप्तांगों पर बर्बरता से लात-घूंसे बरसाए।
घटना का विवरण: CM पोर्टल पर शिकायत से भड़के दरोगा
चौकी में पीड़ित को बनाया निशाना, मारी गुप्तांगों पर लातें
घटना मथुरा जिले की एक स्थानीय चौकी की है, जहां एक 27 वर्षीय युवक ने इलाके के एक दारोगा के दुर्व्यवहार के खिलाफ मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज की थी। शिकायत के कुछ ही दिन बाद युवक को फोन कर चौकी बुलाया गया।
सूत्रों के अनुसार, चौकी में जैसे ही युवक पहुंचा, वहां मौजूद एसआई ने गाली-गलौज शुरू कर दी और फिर अपने साथियों के साथ मिलकर युवक को कमरे में बंद कर दिया। इसके बाद युवक की पैंट उतरवाकर उसके गुप्तांगों पर बेरहमी से लात-घूंसे मारे गए।
पीड़ित की हालत गंभीर, अस्पताल में भर्ती
मानवाधिकार उल्लंघन की हदें पार
घटना के बाद जब युवक की तबीयत बिगड़ी, तो परिजनों ने उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया, जहां डॉक्टरों ने गुप्तांगों में गंभीर चोट और सूजन की पुष्टि की। डॉक्टरों ने बताया कि पीड़ित को लंबे समय तक इलाज की आवश्यकता होगी।
मथुरा पुलिस की बर्बरता से सदमे में आए परिजनों ने कहा कि शिकायत करना ही शायद उनकी सबसे बड़ी गलती थी। अब वह खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं और उन्हें डर है कि कहीं पुलिस बदले की कार्रवाई में और अत्याचार न कर दे।
क्या यही है ‘जनसुनवाई’? पीड़ित ही बन गया अपराधी
मुख्यमंत्री पोर्टल की साख पर भी सवाल
मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल को आम जनता की समस्याओं के समाधान का मंच माना जाता है, लेकिन अगर शिकायत करने वाला ही प्रताड़ना का शिकार बन जाए तो फिर ऐसे पोर्टल का क्या औचित्य?
मथुरा पुलिस की बर्बरता ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है कि क्या इस सिस्टम में आम आदमी की कोई सुनवाई है भी या नहीं? शिकायतकर्ता को ही पीट-पीटकर अस्पताल पहुंचा देने का अधिकार किसने दिया पुलिस को?
पुलिस की ‘सबक सिखाने’ की मानसिकता
कानून के रक्षक ही बन रहे उत्पीड़न के प्रतीक
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में कुछ पुलिसकर्मी खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। शिकायतकर्ता को सबक सिखाना, डराना और मारपीट करना अब आम होता जा रहा है। यह न केवल मथुरा पुलिस की बर्बरता का मामला है, बल्कि एक गहरी मानसिक विकृति की निशानी भी है।
पुलिस महकमा जहां अपने सुधार की बात करता है, वहीं इस तरह की घटनाएं विभाग की साख को मिट्टी में मिला रही हैं।
कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखावा?
एसपी कार्यालय ने कहा, “जांच की जा रही है”
मामला जब सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से वायरल हुआ, तब पुलिस प्रशासन हरकत में आया। जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने जांच के आदेश दे दिए हैं और संबंधित चौकी इंचार्ज को लाइन हाजिर कर दिया गया है।
हालांकि, मथुरा पुलिस की बर्बरता के इस गंभीर मामले में अब तक कोई FIR दर्ज नहीं हुई है। यह सिर्फ “जांच की जा रही है” वाले बयान से ज्यादा कुछ नहीं दिखता।
जनता में उबाल: सोशल मीडिया पर उठी गिरफ्तारी की मांग
#MathuraPoliceBrutality हुआ ट्रेंड
जैसे ही घटना की खबर वायरल हुई, सोशल मीडिया पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा। ट्विटर पर #MathuraPoliceBrutality ट्रेंड करने लगा और लोग आरोपियों की गिरफ्तारी, पीड़ित को मुआवजा और पुलिस सुधार की मांग करने लगे।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों ने इसे पुलिसिया दमन का चरम उदाहरण बताया और NHRC से स्वत: संज्ञान लेने की मांग की।
क्या पुलिस में सुधार अब भी संभव है?
मथुरा पुलिस की बर्बरता एक ऐसा उदाहरण है, जो बताता है कि जब शिकायतकर्ता ही अपराधी बना दिया जाए, तो सिस्टम में सुधार की कितनी जरूरत है। इस घटना से यह भी साफ हो गया कि कुछ पुलिस अधिकारी आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रसित हैं, जो आम आदमी को ‘प्रजा’ समझते हैं, नागरिक नहीं।
अगर इस मामले में सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो यह नजीर बन जाएगा कि उत्तर प्रदेश में न्याय मांगना ही सबसे बड़ा अपराध है।