हाइलाइट्स
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Kanwar Yatra में मुजफ्फरनगर की आशा बनीं आस्था की मिसाल, पैरालाइज्ड पति को पीठ पर बैठाकर पूरी की 180 किलोमीटर की यात्रा
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सचिन पिछले साल ऑपरेशन के बाद हो गए थे अपाहिज, डॉक्टरों ने चलने की उम्मीद छोड़ी
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आशा ने हरिद्वार से मोदीनगर तक की कठिन यात्रा में नहीं छोड़ी अपने पति की साथ
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राहगीरों और श्रद्धालुओं ने आशा को बताया ‘अद्भुत श्रद्धा की देवी’, जगह-जगह मिला सम्मान
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भोलेनाथ के जयकारों के बीच आशा ने मांगी सिर्फ एक दुआ—पति की दोबारा चलने की ताकत
मुजफ्फरनगर की आशा: प्रेम, आस्था और संघर्ष की जीवंत मिसाल
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की एक महिला आशा इन दिनों सोशल मीडिया और धार्मिक हलकों में चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। वजह भी बेहद असाधारण है—आशा ने Kanwar Yatra में अपने पूरी तरह से पैरालाइज्ड पति सचिन को पीठ पर बैठाकर हरिद्वार से मोदीनगर तक 180 किलोमीटर की यात्रा पूरी की। यह कोई साधारण यात्रा नहीं, बल्कि एक पत्नी के प्रेम, त्याग और आस्था की अनुपम मिसाल बन गई है।
क्या है Kanwar Yatra और क्यों होती है इतनी विशेष?
Kanwar Yatra का धार्मिक महत्व
Kanwar Yatra सावन महीने में शिवभक्तों द्वारा गंगाजल लाने की एक पवित्र यात्रा है, जो हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख जैसे तीर्थों से शुरू होकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों तक जाती है।
श्रद्धालु इस यात्रा को नंगे पांव, उपवास और व्रत के साथ पूर्ण करते हैं। इस दौरान हर ‘कांवड़िया’ केवल शिव का नाम लेकर अपनी कठिनाईयों को पार करता है।
मुजफ्फरनगर में आशा नाम की एक महिला ने अपने पैरालाइज्ड पति सचिन को कांवड़ यात्रा कराई !!
सचिन पिछले साल ऑपरेशन के बाद चलने में असमर्थ हो गए थे, आशा ने हरिद्वार से मोदीनगर तक 180 किलोमीटर की यात्रा पति को पीठ पर बैठाकर पूरी की, वह भगवान भोलेनाथ से सचिन के ठीक होने की प्रार्थना कर… pic.twitter.com/fL5EuoVwTu— MANOJ SHARMA LUCKNOW UP🇮🇳🇮🇳🇮🇳 (@ManojSh28986262) July 23, 2025
Kanwar Yatra में पहली बार देखा ऐसा नजारा
हालांकि हर साल लाखों लोग इस यात्रा में शामिल होते हैं, लेकिन आशा जैसी श्रद्धालु पहली बार देखने को मिलीं। जहां अधिकतर लोग अपने शरीर को गंगाजल से पवित्र करने आते हैं, वहीं आशा अपनी आत्मा को प्रेम और सेवा से पवित्र करने निकली थीं।
सचिन की कहानी: एक हादसा और टूटी उम्मीदें
पिछले साल सचिन का एक बड़ा ऑपरेशन हुआ, जिसके बाद वे पूरी तरह से पैरालाइज्ड हो गए। परिवार वालों और डॉक्टरों ने धीरे-धीरे उम्मीद छोड़ दी थी कि वे फिर कभी चल पाएंगे। लेकिन आशा ने न तो हिम्मत हारी और न ही श्रद्धा।
“मैंने भोलेनाथ से वादा किया था, अगर मेरा पति ठीक नहीं हुआ तो मैं उसे खुद अपनी पीठ पर बैठाकर Kanwar Yatra पर ले जाऊंगी।” — आशा
180 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा: पीठ पर पति, हाथों में श्रद्धा
हरिद्वार से मोदीनगर तक की यह यात्रा कठिन चढ़ाई, गर्मी और भीड़ से भरी रही। लेकिन आशा ने न रुकना जाना, न थकना। वह पति को बांधकर पीठ पर लादतीं, सिर पर जल की कांवड़ और हर पड़ाव पर बस एक ही बात कहतीं—
“भोलेनाथ मुझे थकने नहीं देंगे, क्योंकि ये उनके ही चरणों की यात्रा है।”
Kanwar Yatra में श्रद्धालुओं का मिला साथ और सम्मान
रास्ते में कई श्रद्धालुओं और राहगीरों ने आशा के समर्पण को देख उन्हें फूलों से नहलाया, किसी ने जल पिलाया, किसी ने खाना दिया। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो वायरल हो गए और लोग कहने लगे—
“आज भी सती सावित्री जैसी नारियां भारत में हैं, जिनका प्रेम किसी मंदिर से कम नहीं।”
आशा की कामना: ‘भोलेनाथ मेरे पति को फिर से खड़ा कर दें’
आशा का एकमात्र उद्देश्य इस यात्रा से भगवान शिव से अपने पति के ठीक होने की प्रार्थना करना है। उनका कहना है—
“अगर शिव कृपा करें, तो ये शरीर भी फिर से चल सकता है। मुझे अपने सचिन को पहले जैसा मुस्कुराते देखना है।”
प्रशासन और समाज का नजरिया
Muzaffarnagar प्रशासन ने आशा की इस यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि वे एक प्रेरणास्रोत हैं। वहीं कई NGOs ने भी आशा के लिए हेल्थ चेकअप और सचिन के फिजियोथैरेपी में सहयोग का आश्वासन दिया है।
समाज को मिला संदेश: प्रेम, श्रद्धा और त्याग आज भी जिंदा हैं
जहां रिश्ते आजकल मोबाइल नोटिफिकेशन से भी कमजोर हो गए हैं, वहीं आशा जैसी महिला ने दिखा दिया कि विवाह सिर्फ एक रस्म नहीं, एक संकल्प है—सुख-दुख, स्वास्थ्य-रोग सबमें साथ निभाने का।
Kanwar Yatra के दौरान और क्या सीखें हमें?
- सेवा ही सच्चा धर्म है
- ईश्वर से जुड़ने का मार्ग दूसरों की भलाई से होकर जाता है
- जब इच्छाशक्ति प्रबल हो, तो शरीर की सीमाएं टूट जाती हैं
- किसी को पीठ पर ढोना नहीं, श्रद्धा से उठाना कहते हैं
- Kanwar Yatra एक आध्यात्मिक अभ्यास से कहीं बढ़कर एक जीवन पाठशाला है
आशा, सिर्फ नाम नहीं—एक विश्वास है
इस Kanwar Yatra में आशा ने देश को यह दिखा दिया कि नारी सिर्फ शक्ति नहीं, समर्पण की पराकाष्ठा भी है। पति के लिए किए गए इस त्याग ने शिवभक्तों के बीच उन्हें विशेष स्थान दिलाया है।
आज जहां रिश्तों की कीमत लगातार गिर रही है, वहीं आशा ने अपने प्रेम और आस्था से एक नया मानदंड स्थापित किया है।