हाइलाइट्स
- Gender Biased Laws की आड़ में महिलाओं द्वारा घरेलू हिंसा करने के बढ़ते मामलों पर सवाल उठने लगे हैं।
- पति पर हमला करने का लाइव वीडियो सामने आने के बावजूद महिला की गिरफ्तारी नहीं हुई।
- मासूम बेटी ने मां को रोका, फिर भी किसी ने महिला के खिलाफ FIR नहीं कराई।
- समाज में पुरुष पीड़ितों की आवाज़ दबाई जा रही है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ रहा है।
- स्त्री-केंद्रित कानूनों के दुरुपयोग के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं, लेकिन इस पर कोई गंभीर बहस नहीं।
भारत में जहां एक ओर महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम कानून बनाए गए हैं, वहीं दूसरी ओर इन्हीं कानूनों का दुरुपयोग एक गंभीर सामाजिक समस्या बनता जा रहा है। ताज़ा मामला एक वायरल वीडियो का है जिसमें एक महिला अपने पति को चाकू से हमला करते हुए कैमरे में कैद हुई, और वह भी अपनी मासूम बेटी की मौजूदगी में। वीडियो में बच्ची रोती है, मां को पीछे से पकड़ती है, मगर महिला नहीं रुकती। पति चीखता है लेकिन उसे मार से बचाने कोई नहीं आता।
वायरल वीडियो ने खोली हकीकत
यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैला। लोगों की प्रतिक्रियाएं दो भागों में बंटी हुई थीं—एक ओर महिला के हिंसक व्यवहार की निंदा हो रही थी, वहीं दूसरी ओर एक बड़ा तबका यह पूछ रहा था कि अब तक उस महिला के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या यही Gender Biased Laws का परिणाम है?
जब कानून एकतरफा हो जाए: Gender Biased Laws पर सवाल
भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कानून बनाए गए हैं, जैसे कि घरेलू हिंसा अधिनियम (Protection of Women from Domestic Violence Act 2005), दहेज प्रताड़ना धारा 498A, और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न विरोधी अधिनियम। ये सभी कानून महिला पीड़िताओं के लिए बेहद जरूरी थे और आज भी हैं।
लेकिन आज जब इन कानूनों का उपयोग महिलाओं द्वारा पुरुषों को मानसिक, शारीरिक या आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए किया जाने लगे, तो यह Gender Biased Laws का स्वरूप ले लेता है।
पत्नी कैमरे के सामने अपने पति को चाकू मार रही है! उसे कोई परवाह नहीं! क्यों? क्योंकि उसे पता है कि देश का कानून उसे सहलाएगा !!
और पति को भी पता है कि अगर उसने अपना ज़रा भी बचाव किया, तो उसे जेल हो जाएगी !!
मासूम बच्ची को भी पता है कि उसकी मां गलत है, इसीलिए वह मां को पीछे से… pic.twitter.com/yXdv7xiG1c— MANOJ SHARMA LUCKNOW UP🇮🇳🇮🇳🇮🇳 (@ManojSh28986262) July 23, 2025
पुरुषों की चुप्पी: मजबूरी या भय?
भारत में समाज पुरुषों को हमेशा ‘स्ट्रॉन्ग’ और ‘भावनाहीन’ मानता रहा है। जब कोई पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार होता है, तो उसे न सिर्फ कानूनी समर्थन नहीं मिलता, बल्कि समाज भी उसका मज़ाक उड़ाता है। पुरुषों को शिकायत करने में शर्म आती है, और यदि वह शिकायत कर भी दें, तो पुलिस या न्यायपालिका की ओर से उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता।
वायरल वीडियो में भी यही हुआ। महिला ने चाकू से हमला किया, बेटी ने गवाही दी, सबूत मौजूद हैं, फिर भी महिला को हिरासत में नहीं लिया गया। वजह? Gender Biased Laws।
क्या कहती हैं रिपोर्ट्स?
- NCRB की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में पुरुषों द्वारा दायर की गई घरेलू हिंसा की शिकायतें 28% तक बढ़ी हैं।
- हालांकि, इनमें से 90% शिकायतें या तो दर्ज नहीं हुईं, या फिर अदालत में खारिज कर दी गईं।
- मानसिक प्रताड़ना, झूठे केस, आत्महत्या के बढ़ते मामले पुरुषों के खिलाफ घरेलू हिंसा की गंभीरता को दर्शाते हैं।
बेटी की चीख भी न रोकी मां की हिंसा
वीडियो में सबसे दिल दहला देने वाला दृश्य था उस मासूम बच्ची का, जो अपनी मां को रोकने का प्रयास कर रही थी। वह बार-बार कहती है, “मम्मी नहीं मारो पापा को…” मगर महिला नहीं रुकती।
यह दृश्य कई सवाल छोड़ जाता है:
- क्या उस बच्ची का मानसिक संतुलन स्थिर रहेगा?
- क्या वह भविष्य में रिश्तों पर विश्वास कर पाएगी?
- क्या समाज उसे यह समझा पाएगा कि हिंसा केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है?
विशेषज्ञों की राय
साइकोलॉजिस्ट डॉ. नीलिमा अग्रवाल कहती हैं:
“जब एक पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार होता है, तो वह खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करता है। उसके पास न समाज की सहानुभूति होती है, न ही कानून की।”
कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट धर्मवीर सिंह का कहना है:
“Gender Biased Laws की वजह से आज पुरुषों के लिए न्याय पाना कठिन हो गया है। न्याय का आधार लिंग नहीं, सबूत होना चाहिए।”
कानूनों की समीक्षा समय की मांग
भारत में स्त्री-सुरक्षा कानूनों की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अब समय आ गया है कि इन कानूनों की निष्पक्ष समीक्षा हो।
क्या कोई ‘Gender Neutral Law’ नहीं हो सकता जो पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान सुरक्षा दे?
क्या ‘Protection of Persons from Domestic Violence Act’ नहीं बन सकता?
बदलाव जरूरी है, ताकि न्याय सभी के लिए हो
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब Gender Biased Laws पर गंभीर बहस की आवश्यकता है।
सिर्फ महिला को पीड़िता मान लेना, और पुरुष को आरोपी मान लेना न्याय नहीं है।
न्याय को सबूतों, गवाहों और निष्पक्षता पर आधारित होना चाहिए, न कि लिंग के आधार पर।
अगर कानूनों की इस असमानता को जल्द नहीं सुधारा गया, तो समाज में असंतुलन और मानसिक तनाव का स्तर और अधिक बढ़ेगा, जिससे न केवल पुरुष, बल्कि उनके परिवार, बच्चे और आने वाली पीढ़ियां भी प्रभावित होंगी।