सिंध के सन्नाटों में दब गई हिंदू बेटियों की चीखें: जबरन धर्मांतरण और निकाह का बढ़ता ख़ौफ़

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हाइलाइट्स

  • Forced Conversion के बढ़ते मामलों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की खामोशी
  • जुलाई 2025 में सिंध के संगहर ज़िले से तीन नाबालिग हिंदू लड़कियों के अपहरण और Forced Conversion का मामला गरमा गया
  • स्थानीय अदालतों में Forced Conversion के केसों की संख्या पाँच साल में दोगुनी हुई
  • Forced Conversion रोकने के लिए पाकिस्तान में कोई संघीय कड़ा क़ानून अब तक पास नहीं हो सका
  • Forced Conversion के डर से सैकड़ों हिंदू परिवारों का आंतरिक विस्थापन जारी

सिंध में Forced Conversion की नई लहर

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में Forced Conversion कोई नया शब्द नहीं है; यह डर, असुरक्षा और सामुदायिक संकट का पर्याय बन चुका है। जून 2025 में शाहदादपुर में चार हिंदू भाई‑बहनों के एक साथ अपहरण और Forced Conversion ने फिर से ज़ख़्म हरे कर दिए। 21 जून को सामने आए इस मामले ने दिखा दिया कि Forced Conversion अब संगठित स्वरूप ले चुका है।

धर्मांतरण, निकाह और न्याय व्यवस्था

अदालतें बनाम परिवार की पुकार

16 जुलाई 2025 को हैदराबाद (सिंध) की अदालत में तीन नाबालिग लड़कियों ने बयान दिया कि वे ‘स्वेच्छा से इस्लाम कबूल कर निकाह कर चुकी हैं’। लेकिन उनके माता‑पिता ने इसे साफ तौर पर Forced Conversion बताया। अदालत के बाहर जुटे प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए—‘Forced Conversion बंद करो’। यह दृश्य बताता है कि ForcedConversion केवल कानूनी बहस नहीं, मानवीय त्रासदी भी है।

केस बढ़ने की वजहें

विशेषज्ञ मानते हैं कि Forced Conversion के केस गरीबी, जातीय भेदभाव और कमजोर कानून‑व्यवस्था की तिकड़ी से पैदा होते हैं। कई बार स्थानीय प्रभावशाली लोग ‘इच्छुक निकाह’ के नाम पर Forced Conversion को वैधता दिलवा देते हैं। शाहदादपुर के मामले में भी 13‑वर्षीय लड़के को लेकर माँ का बयान साफ कहता है कि यह Forced Conversion था, न कि स्वैच्छिक धर्मांतरण।

स्थानीय दबाव समूहों की भूमि

ग्रामीण इलाकों में प्रभावशाली जमींदार और धार्मिक मदरसों के गठजोड़ Forced Conversion को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये समूह अदालतों पर भी दबाव डालते हैं, जिससे Forced Conversion के मामलों में जल्दबाज़ी में फ़ैसले होते हैं।

आँकड़े क्या कहते हैं?

सिंध मानवाधिकार आयोग (SHRC) की रिपोर्ट बताती है कि 2020‑24 के बीच Forced Conversion के 274 प्रकरण दर्ज हुए, जिनमें 78 % पीड़ित नाबालिग लड़कियाँ थीं। रिपोर्ट खास तौर पर Forced Conversion और बाल विवाह के गहरे रिश्ते को रेखांकित करती है।

कानूनी ढाँचों की सीमाएँ

Sindh Child Marriage Restraint Act और Forced Conversion

सिंध Child Marriage Restraint Act‑2013 बाल विवाह को अपराध घोषित करता है, फिर भी Forced Conversion की राह में यह दीवार नहीं बन सका। विशेषज्ञ कहते हैं कि जब तक Forced Conversion को लेकर संघीय स्तर पर सख़्त क़ानून नहीं बनेगा, समस्या टलेगी नहीं।

Pakistan Hindu Marriage Act‑2017

इस क़ानून ने हिंदू विवाह का आधिकारिक पंजीकरण तो संभव किया, पर Forced Conversion से उपजी शादियों को चुनौती देने के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं जोड़ा। कानूनविदों का तर्क है कि Forced Conversion के मामलों में पीड़ित परिवार की बात सुने बिना फ़ैसला होना न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।

सामाजिक‑आर्थिक असर

शिक्षा और रोज़गार पर प्रभाव

Forced Conversion के बाद ज़्यादातर लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। जिन ज़िलों में Forced Conversion अधिक है, वहीं हिंदू छात्राओं के ड्रॉप‑आउट रेट 12 % तक अधिक दर्ज किए गए।

मानसिक स्वास्थ्य का संकट

Forced Conversion झेलने वाली लड़कियों में PTSD और अवसाद के लक्षण सामान्य से तीन गुना अधिक पाए गए। मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि Forced Conversion का डर संपूर्ण समुदाय को सामूहिक ट्रॉमा की ओर धकेल रहा है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और ‘सिंध पार’ की चिंता

भारत में बढ़ती सजगता

भारतीय संसद के कई सदस्यों ने Forced Conversion के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र तक ले जाने की माँग उठाई है। उनका तर्क है कि Forced Conversion मानवाधिकार उल्लंघन है, जो सरहदों का सम्मान नहीं करता। सोशल मीडिया पर #StopForcedConversion ट्रेंड कर चुका है, और भारत में सनातन समाज इसे चेतावनी मान रहा है कि आज Forced Conversion अगर सिंध में है तो कल सीमा पार भी दस्तक दे सकता है।

वैश्विक संस्थाओं की भूमिका

एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने Forced Conversion को लेकर पाकिस्तान सरकार से स्वतंत्र न्यायिक आयोग बनाने की माँग की है। पर रिपोर्टिंग बाधाओं व सुरक्षा जोखिमों के कारण Forced Conversion की जाँच कछुआ‑गति से चल रही है।

समाधान की राह

सख़्त क़ानून और त्वरित न्याय

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का सुझाव है कि Forced Conversion रोकने के लिए ‘मैरिज रजिस्ट्री पोर्टल’ बनाया जाए, जहाँ हर अंतर‑धार्मिक विवाह के लिए 90‑दिन की नोटिस अवधि अनिवार्य हो। इससे Forced Conversion के संभावित मामलों पर प्रशासन और समुदाय दोनों नज़र रख सकेंगे।

सामुदायिक जागरूकता अभियान

Forced Conversion के ख़तरे को कम करने हेतु स्कूल‑कॉलेजों और पंचायतों में मानवाधिकार शिक्षा दी जानी चाहिए। धार्मिक नेताओं को भी स्पष्ट रूप से Forced Conversion के विरुद्ध बयान देना होगा।

डिजिटल साक्ष्य का संरक्षण

शाहदादपुर के वायरल वीडियो ने सिद्ध किया कि Forced Conversion से जुड़े डिजिटल सबूत न्याय‑प्रक्रिया को तेज़ कर सकते हैं। इसलिए साइबर‑सेल की अलग इकाई बनाकर Forced Conversion मामलों की मॉनिटरिंग अनिवार्य है।

Forced Conversion केवल दो शब्द नहीं, बल्कि हज़ारों हिंदू लड़कियों की अस्मिता का प्रश्न है। जब तक Forced Conversion पर बहस महज़ सोशल मीडिया तक सीमित रहेगी, ज़मीनी सच्चाई नहीं बदलेगी। पाकिस्तान के लोकतांत्रिक संस्थानों को समझना होगा कि Forced Conversion उनके संवैधानिक मूल्यों के ख़िलाफ़ है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय समुदाय व भारत को साझा रणनीति बनानी होगी, ताकि ‘जो सिंध में होता है, वह सिंध में ही न रह जाए’।

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