हाइलाइट्स
- PM Kisan Scam के तहत राजस्थान के पाली जिले में हजारों फर्जी मुस्लिम नामों से किसान सम्मान निधि की राशि उठाई गई।
- देसूरी, रानी और मारवाड़ जंक्शन गांवों में 20,000+ फर्जी खातों का हुआ खुलासा, जबकि सभी गांवों में कोई मुस्लिम नहीं रहता।
- फर्जी खाताधारकों के नाम उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़े मिले, जिनमें 90% मुस्लिम नाम हैं।
- यह फर्जीवाड़ा साल 2020 में हुआ, पर अधिकारियों ने जानकारी दबा दी, एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई।
- जांच में सामने आया कि सभी खाते एक ही दिन में सरकारी पोर्टल पर स्वीकृत हुए, जिससे गहरी साजिश की आशंका।
राजस्थान के पाली जिले में सामने आया करोड़ों का PM Kisan Scam,
मुस्लिम नामों से बने हजारों फर्जी अकाउंट
राजस्थान के पाली जिले से एक बेहद चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है, जिसे PM Kisan Scam के नाम से जाना जा रहा है। इस घोटाले में ऐसे गांव शामिल हैं जहां एक भी मुस्लिम नहीं रहता, लेकिन फिर भी हजारों मुस्लिम नामों से फर्जी अकाउंट खोलकर प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना का पैसा निकाल लिया गया।
हिंदू गांव, लेकिन खाते मुस्लिमों के नाम पर!
पाली जिले के देसूरी, रानी और मारवाड़ जंक्शन गांवों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत लाखों रुपये ट्रांसफर किए गए। लेकिन जब इसकी गहराई से जांच की गई तो सामने आया कि ये सभी अकाउंट फर्जी हैं।
इन गांवों में एक भी मुस्लिम नहीं रहता, जबकि अकाउंट में जो नाम दर्ज हैं वो 90% मुस्लिम समुदाय से जुड़े हैं। यह मामला जब सार्वजनिक हुआ तो पूरे प्रशासन में हड़कंप मच गया।
PM Kisan Scam: अब तक के आंकड़े
- देसूरी गांव: 20,000 फर्जी अकाउंट
- रानी गांव: 9,004 फर्जी अकाउंट
- मारवाड़ जंक्शन: 62 फर्जी अकाउंट
इन सभी खातों के माध्यम से किसानों के नाम पर सरकारी निधि निकाली गई, जबकि संबंधित व्यक्ति उस गांव में कभी रहे ही नहीं।
कहां से आए ये नाम?
जांच में पता चला कि ये फर्जी नाम उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के रहने वाले लोगों के हैं। इनमें से ज्यादातर नाम मुस्लिम समुदाय से हैं। यह PM Kisan Scam इसलिए और भी भयावह हो जाता है क्योंकि इन खातों का पंजीकरण एक ही समय में किया गया था, और उन्हें उसी दिन सरकारी पोर्टल से मंजूरी भी मिल गई।
2020 में हुआ था घोटाला, लेकिन अब खुला मामला
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह PM Kisan Scam साल 2020 में हुआ था। लेकिन तब किसी भी अधिकारी ने एफआईआर तक दर्ज नहीं करवाई। अधिकारियों ने चुपचाप इस मामले को दबा दिया और केवल खातों में पैसे जाने पर रोक लगा दी।
लेकिन अब जब मीडिया और स्थानीय जांच एजेंसियों ने मामले को फिर से उठाया, तो पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है।
फर्जीवाड़े की प्रक्रिया: कैसे हुआ ये घोटाला?
- फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुस्लिम नामों से खातों का पंजीकरण किया गया।
- एक ही IP और समय पर सारे आवेदन पोर्टल पर डाले गए।
- अधिकारीयों की मिलीभगत से सभी खातों को मंजूरी मिल गई।
- सरकारी धन ट्रांसफर किया गया – जिससे PM Kisan Scam ने आकार लिया।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
इस पूरे PM Kisan Scam में सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की चुप्पी पर उठता है। साल 2020 से लेकर अब तक यह घोटाला छिपा क्यों रहा?
क्या इसमें अधिकारी भी शामिल थे?
अगर नहीं, तो किसी गांव में जहां मुस्लिम रहता ही नहीं, वहां उनके नामों से खाते कैसे खुल गए?
क्या कहता है स्थानीय प्रशासन?
पाली जिले के कुछ अधिकारियों का कहना है कि यह पूरा मामला अब जांच के अधीन है, और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी पहले से जानते थे, लेकिन राजनीतिक दबाव में मौन रहे।
PM Kisan Scam से जुड़े कुछ चौंकाने वाले तथ्य
- सभी फर्जी अकाउंट एक ही दिन पंजीकृत हुए।
- एक ही गांव में हजारों मुस्लिम नामों के खाते, जबकि वहां कोई मुस्लिम नहीं।
- 90% नाम उत्तर भारत के मुस्लिम क्षेत्रों से लिए गए।
- साल 2020 से तीन साल तक कोई FIR नहीं हुई।
- सभी खातों को सरकारी मंजूरी भी तत्काल मिली, जो दुर्लभ है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी शुरू
भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इस PM Kisan Scam पर सवाल उठाए हैं। भाजपा ने इसे “राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा घोटाला” बताया, जबकि कांग्रेस ने “केंद्र की लापरवाही और पोर्टल की खामियों” पर निशाना साधा है।
ग्रामीणों की मांग: सीबीआई जांच हो
पाली जिले के कई गांवों में ग्रामीणों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, और वे मांग कर रहे हैं कि इस PM Kisan Scam की CBI से जांच कराई जाए। उनका कहना है कि अगर यह घोटाला आज सामने न आता, तो सरकारी पैसे की और भी ज्यादा लूट होती।
तकनीक का लाभ या लापरवाही का घातक परिणाम?
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना जैसे योजनाएं गरीब किसानों की मदद के लिए बनी हैं, लेकिन इस तरह के PM Kisan Scam यह दिखाते हैं कि कैसे तकनीकी खामियों और भ्रष्टाचार के चलते योजनाएं आम आदमी तक न पहुँचकर दलालों के हाथों में चली जाती हैं।
यह घटना सरकार के पोर्टल, सत्यापन और डेटा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।