हाइलाइट्स
- तेंदुए का आतंक बढ़ने से पुणे के पिंपरखेड़ गांव में दहशत का माहौल
- ग्रामीण खुद को बचाने के लिए स्पाइक कॉलर और बिजली की तारों का सहारा ले रहे हैं
- एक महीने में तीन लोगों की मौत, कई लोग घायल
- खेती, स्कूल और रोजमर्रा की दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित
- फॉरेस्ट विभाग ने एक आदमखोर तेंदुए को मार गिराया, गांववालों की चिंता बनी हुई
पुणे के पिंपरखेड़ गांव में तेंदुए का आतंक चरम पर, ग्रामीणों ने अपनाया अनोखा तरीका
महाराष्ट्र के पुणे जिले के पिंपरखेड़ गांव में तेंदुए का आतंक इस हद तक बढ़ चुका है कि लोग अपने ही खेतों और घरों में जाने से डर रहे हैं। पिछले एक महीने में हुए लगातार हमलों ने पूरे गांव में ऐसा डर पैदा किया है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को ठहराव की स्थिति में ला चुका है।
गांव के लोग अपनी सुरक्षा के लिए स्पाइक वाले कॉलर पहने दिखाई दे रहे हैं। महिलाएं और पुरुष खेतों में उसी समय कदम रखते हैं, जब वे समूह में हों। कहीं बिजली की तार लगी है, तो कहीं लोहे की ग्रिलें। हर तरफ सिर्फ एक ही डर दिखाई देता है—तेंदुए का आतंक।
तेंदुए के लगातार हमले
एक महीने में तीन जानें गईं
पिंपरखेड़ गांव में तेंदुए का आतंक नया नहीं, लेकिन इस बार यह पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हुआ है।
बीते 30 दिनों में एक 5 साल की बच्ची, 82 साल की एक बुजुर्ग महिला और 13 साल का एक लड़का तेंदुए का शिकार बन चुके हैं।
इन तीनों घटनाओं ने गांव के हर व्यक्ति के मन में यह स्थायी डर बैठा दिया है कि यह खतरा कभी भी, कहीं भी सामने आ सकता है। खेत से लेकर घर तक कोई भी जगह अब सुरक्षित महसूस नहीं होती।
ग्रामीणों का भय: “खेत जाना अब जान जोखिम में डालने जैसा”
रोजमर्रा की जिंदगी पर भारी पड़ा तेंदुए का आतंक
गांव के किसान विट्ठल रंगनाथ जाधव बताते हैं कि खेती ही उनका एकमात्र सहारा है। लेकिन तेंदुए का आतंक ऐसा है कि खेतों में अकेले जाना संभव नहीं रहा।
वे कहते हैं,
“हम हर दिन तेंदुए को देखते हैं। वह कभी भी खेत में आ सकता है। डर के बिना दिन नहीं गुजरता। हमारी रोजी-रोटी इसी जमीन पर निर्भर है, इसलिए हम घर पर नहीं बैठ सकते।”
जाधव बताते हैं कि उनकी मां भी एक महीने पहले तेंदुए के हमले की शिकार हुई थीं। यह घटना उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के लिए सदमे की तरह थी।
गांववाले बताते हैं कि वे सुबह और शाम के समय बाहर निकलने से कतराते हैं, क्योंकि यही समय तेंदुए की सक्रियता का होता है।
तेंदुए का आतंक इस कदर फैल चुका है कि गांवों की सामूहिक गतिविधियां भी प्रभावित हुई हैं।
सुरक्षा के नए उपाय
स्पाइक कॉलर से बिजली के तार तक
तेंदुए का आतंक से बचने के लिए ग्रामीण अब कई तरह के उपाय कर रहे हैं।
1. स्पाइक कॉलर
पुराने समय में जानवरों को बचाने के लिए लगाए जाने वाला स्पाइक कॉलर अब इंसानों की गर्दन पर दिख रहा है।
ग्रामीण मानते हैं कि अगर तेंदुआ पीछे से हमला करता है, तो ये कांटे उसकी पकड़ कमजोर कर सकते हैं।
2. ग्रुप में खेती
अब गांव का कोई भी व्यक्ति अकेले खेत नहीं जाता।
लोग समूह बनाकर जाते हैं, ताकि किसी हमले की स्थिति में बचाव किया जा सके।
3. बिजली की तारें और लोहे की ग्रिल
घर के चारों ओर बिजली की तारें लगाई जा रही हैं, ताकि तेंदुए को अंदर आने से रोका जा सके।
कई परिवारों ने अपने घरों के दरवाजों और दीवारों पर लोहे की मजबूत ग्रिलें भी लगा दी हैं।
इन सभी उपायों के बावजूद, तेंदुए का आतंक अभी भी गांववालों के सिर पर मंडरा रहा है।
बच्चों की सुरक्षा पर सबसे बड़ी चिंता
स्कूलों का समय बदला जा सकता है
बच्चों के माता-पिता का कहना है कि वे सुबह-सुबह बच्चों को स्कूल भेजने से डरते हैं।
इसलिए गांव की पंचायत और स्कूल प्रशासन सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक का नया टाइमिंग लागू करने पर विचार कर रहा है।
ये बदलाव सिर्फ इसलिए किए जा रहे हैं ताकि बच्चे उन घंटों में घर से बाहर न निकलें, जब तेंदुए का आतंक सबसे ज्यादा रहता है।
फॉरेस्ट विभाग की कार्रवाई
एक आदमखोर तेंदुआ मार गिराया गया
लगातार बढ़ते तेंदुए के आतंक के बीच फॉरेस्ट विभाग ने एक संयुक्त ऑपरेशन चलाया।
5 नवंबर को पिंपरखेड़ और आसपास के इलाकों में तीन मौतों के लिए जिम्मेदार एक आदमखोर तेंदुए को मार गिराया गया।
इसके लिए कैमरा ट्रैप और थर्मल ड्रोन का इस्तेमाल किया गया।
तेंदुआ घटनास्थल से 400 से 500 मीटर की दूरी पर पाया गया और ऑपरेशन के बाद उसका शव ग्रामीणों को दिखाया गया।
इसके बाद शव को मानिकदोह लेपर्ड रेस्क्यू सेंटर भेजा गया।
फॉरेस्ट अधिकारी मानते हैं कि इस तेंदुए को खत्म करने से तेंदुए का आतंक कुछ कम हो सकता है, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती।
क्या तेंदुओं की संख्या बढ़ रही है?
विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में जंगलों से सटे गांवों में तेंदुए का आतंक बढ़ा है।
इसकी मुख्य वजह है जंगलों में भोजन की कमी, बढ़ता शहरीकरण और मनुष्यों के साथ बढ़ता संपर्क।
पिंपरखेड़ गांव भी जंगल की सीमा से ज्यादा दूर नहीं है।
ऐसे में तेंदुओं का गांवों में आना नई बात नहीं, लेकिन जिस तरह से यह खतरा मौत का कारण बन रहा है, वह चिंता का विषय है।
#WATCH | Pune, Maharashtra | Amid a surge in leopard attacks across several villages in Pune, residents are taking unusual precautions to protect themselves. Local residents in Pimperkhed village, Shirur tahsil, Pune, are wearing collars and belts with sharp iron nails around… pic.twitter.com/8kCeuOcL6U
— ANI (@ANI) November 22, 2025
ग्रामीणों की अपील: “सरकार तुरंत कदम उठाए”
पिंपरखेड़ गांव के लोग अब सिर्फ एक ही मांग कर रहे हैं—सुरक्षा।
वे चाहते हैं कि सरकार इस समस्या की जड़ तक पहुंचे और तेंदुए का आतंक खत्म करने के लिए स्थायी उपाय करे।
कई गांववालों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो भविष्य में खेती करना मुश्किल हो जाएगा और गांव खाली भी हो सकता है।
तेंदुए का आतंक ने पिंपरखेड़ गांव की जिंदगी बदल कर रख दी है।
लोग खेतों में जाते हुए डरते हैं, बच्चों को स्कूल भेजने में हिचकते हैं और रात होने से पहले घर पहुंच जाना सुरक्षित मानते हैं।
फॉरेस्ट विभाग की कार्रवाई से कुछ राहत मिली है, लेकिन यह संकट अभी खत्म नहीं हुआ है।
गांववालों को उम्मीद है कि जल्द ही ऐसी योजनाएं बनेंगी, जिससे उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और तेंदुए का आतंक हमेशा के लिए खत्म हो जाए।